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यमकेश्वर। यमकेश्वर विधानसभा में केंद्रीय विद्यालय की स्थापना की मांग को लेकर अब भाजपा के भीतर ही श्रेय की सियासत के सवाल उठने लगे हैं। गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी द्वारा केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी से मुलाकात कर यमकेश्वर में केंद्रीय विद्यालय की स्थापना की मांग किए जाने के बाद विधायक रेनू बिष्ट की सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा में है।
सांसद अनिल बलूनी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री से मुलाकात के बाद स्पष्ट रूप से बताया कि उन्होंने गैरसैंण, रामनगर, यमकेश्वर विधानसभा क्षेत्र और देवप्रयाग में केंद्रीय विद्यालयों की स्थापना का अनुरोध किया है। शिक्षा मंत्री ने भी इस विषय पर आवश्यक कार्रवाई के लिए सकारात्मक आश्वासन दिया।
दूसरी ओर विधायक रेनू बिष्ट की ओर से जारी पोस्ट में 18 अगस्त को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह से मुलाकात और यमकेश्वर में केंद्रीय विद्यालय की मांग उठाने का उल्लेख किया गया है। विधायक ने दावा किया है कि उन्होंने अमित शाह के समक्ष पत्र प्रस्तुत कर शिक्षा मंत्री को आवश्यक कार्रवाई के लिए पत्र भेजने का अनुरोध किया था।
सवाल यह है कि पहल किसकी और श्रेय किसका?
यहीं से राजनीतिक सवाल खड़ा होता है। यदि विधायक ने 18 अगस्त को अमित शाह के समक्ष अपनी मांग रखी थी और सांसद अनिल बलूनी ने बाद में सीधे केंद्रीय शिक्षा मंत्री से मुलाकात कर उसी यमकेश्वर क्षेत्र में केंद्रीय विद्यालय की मांग रखी, तो विधायक की पोस्ट में सांसद की ओर से शिक्षा मंत्री के समक्ष की गई पहल का उल्लेख क्यों नहीं है?
क्या विधायक अपनी पहले की पहल को जनता के सामने प्रमुखता से रखकर यह संदेश देना चाह रही हैं कि यमकेश्वर में केंद्रीय विद्यालय लाने की पहल उन्हीं की है?
या फिर इसे इस रूप में देखा जाए कि विधायक और सांसद दोनों अपने-अपने स्तर पर एक ही मांग को आगे बढ़ा रहे हैं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा के भीतर यमकेश्वर के विकास कार्यों का श्रेय लेने को लेकर अनकही प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है?
क्योंकि जिस मुद्दे को लेकर सांसद अनिल बलूनी ने सीधे केंद्रीय शिक्षा मंत्री से मुलाकात की, उसी मुद्दे को विधायक रेनू बिष्ट भी अपने राजनीतिक प्रयास के रूप में प्रमुखता से प्रचारित कर रही हैं। इससे क्षेत्र में यह चर्चा स्वाभाविक है कि क्या विधायक सांसद बलूनी के प्रयास से आगे निकलकर खुद को यमकेश्वर के लिए बड़ा चेहरा साबित करने की कोशिश कर रही हैं?
हालांकि यह भी संभव है कि दोनों जनप्रतिनिधियों का उद्देश्य सिर्फ यमकेश्वर में केंद्रीय विद्यालय स्थापित कराना हो और अलग-अलग स्तर पर की गई पहल को लेकर कोई राजनीतिक प्रतिस्पर्धा न हो। लेकिन सोशल मीडिया पर सामने आ रही दोनों नेताओं की पोस्ट ने ‘काम कौन कर रहा है और श्रेय कौन ले रहा है’ वाली बहस को जरूर जन्म दे दिया है।
जनता को चाहिए विद्यालय, श्रेय की लड़ाई नहीं
यमकेश्वर की जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्रीय विद्यालय की मांग कागजों से निकलकर धरातल पर पहुंचे। सांसद हों या विधायक—जिसके प्रयास से विद्यालय की स्वीकृति होती है, उसका स्वागत होना चाहिए।लेकिन राजनीतिक रूप से देखा जाए तो सांसद अनिल बलूनी की पहल इसलिए ज्यादा प्रत्यक्ष नजर आती है क्योंकि उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री से स्वयं मुलाकात कर यमकेश्वर का मुद्दा सीधे उसी मंत्रालय के सामने रखा, जो केंद्रीय विद्यालयों से संबंधित निर्णय लेता है।
अब सवाल विधायक रेनू बिष्ट से भी पूछा जाना स्वाभाविक है—
क्या वह सांसद अनिल बलूनी के प्रयास को स्वीकार करते हुए उनके साथ मिलकर यमकेश्वर के लिए पैरवी करेंगी, या फिर केंद्रीय विद्यालय की पूरी पहल का श्रेय अपने नाम से आगे बढ़ाएंगी?
यमकेश्वर में विद्यालय बनेगा तो बच्चों का भविष्य संवरेगा, लेकिन उससे पहले यह राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा हो गया है—‘काम बलूनी का या दावा बिष्ट का?’








