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ऋषिकेश। ऋषिकेश में मोक्ष आनंद आश्रम से जुड़े शैक्षणिक संस्थानों में वित्तीय अनियमितताओं और करोड़ों रुपये के कथित गबन का मामला सामने आया है।मोक्ष आनंद आश्रम के अध्यक्ष अमित जैन की ओर से दी गई शिकायत के आधार पर पुलिस ने पूर्व कर्मचारी सचिन जैन के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि संस्थान में लंबे समय तक कार्यरत रहे सचिन जैन ने कथित तौर पर रसीदों और बिल-बाउचर में हेराफेरी कर संस्थान की रकम का गबन किया। शिकायतकर्ता ने करीब आठ करोड़ रुपये की राशि के गबन का आरोप लगाया है। इसके अतिरिक्त संस्थान के खातों में जमा बताई गई 1,04,39,205 रुपये की रकम का हिसाब और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने की बात भी एफआईआर में कही गई है।
पुलिस ने 7 अक्टूबर 2026 को मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है। हालांकि, एफआईआर में लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही हो सकेगी।
2002 में हुई थी कर्मचारी की नियुक्ति
एफआईआर में दर्ज शिकायत के अनुसार, शिकायतकर्ता आनंद आश्रम मां सोसायटी, ऋषिकेश से जुड़े संस्थानों के अध्यक्ष हैं। शिकायत में बताया गया है कि सचिन जैन को वर्ष 2002 में संस्थान में नियुक्त किया गया था। उस समय वह बेरोजगार था और उसके पास परिवार के भरण-पोषण के लिए आय का कोई अन्य साधन नहीं था। शिकायतकर्ता के अनुसार, इसी आधार पर उसे संस्थान में रोजगार दिया गया।शिकायत में आगे कहा गया है कि वर्ष 2005 में सचिन जैन को संस्थान का सचिव नियुक्त किया गया। इसके बाद संस्थान से संबंधित महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी उसे सौंप दी गईं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि लंबे समय तक विश्वास के आधार पर काम करने के कारण संस्थान के वित्तीय लेन-देन और लेखा-जोखा की नियमित गहन जांच नहीं हो सकी।
कई शैक्षणिक संस्थानों के वित्तीय लेन-देन में गड़बड़ी का आरोप
शिकायत में मोक्ष आनंद आश्रम से जुड़े कई संस्थानों का उल्लेख किया गया है। इनमें शीतल कॉलेज ऑफ बायोमेडिकल साइंस, शीतल वैदिक संस्थान और धर्मा वैदिक संस्थान सहित अन्य संस्थानों से संबंधित वित्तीय लेन-देन की जांच का विषय उठाया गया है।
शिकायतकर्ता के अनुसार, संबंधित संस्थानों की आय और खर्च का लेखा-जोखा रखने की जिम्मेदारी सचिन जैन के पास थी। आरोप है कि इसी जिम्मेदारी का कथित दुरुपयोग करते हुए संस्थान की रकम का हिसाब छिपाया गया और कुछ वित्तीय दस्तावेजों में हेराफेरी की गई।
एफआईआर में दावा किया गया है कि जब संस्थान के खातों, रसीदों और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड की जांच की गई तो कई अनियमितताएं सामने आईं। शिकायतकर्ता का आरोप है कि संबंधित कर्मचारी से संपूर्ण रिकॉर्ड और मूल दस्तावेज मांगे गए, लेकिन उन्हें उपलब्ध नहीं कराया गया।
फर्जी रसीदें और कूटरचित दस्तावेज तैयार करने का आरोप
एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि संस्थान की रकम के लेन-देन को सही दिखाने के लिए कथित तौर पर कूटरचित रसीदें और दस्तावेज तैयार किए गए। शिकायतकर्ता के अनुसार, इन दस्तावेजों के आधार पर वित्तीय रिकॉर्ड में रकम का हिसाब दिखाया जाता रहा, जबकि वास्तविक लेन-देन और संस्थान के रिकॉर्ड में अंतर होने का संदेह है।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि रसीदों और बिल-बाउचर के आधार पर संस्थान को भ्रमित किया गया तथा कथित अनियमितताओं को छिपाने का प्रयास किया गया। शिकायतकर्ता ने इसे विश्वास का दुरुपयोग और संस्थान को आर्थिक नुकसान पहुंचाने का मामला बताया है।इन आरोपों के संबंध में पुलिस की जांच महत्वपूर्ण होगी। दस्तावेजों की प्रामाणिकता, वास्तविक लेन-देन और धनराशि के उपयोग की जांच के बाद ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
करीब 8 करोड़ रुपये के गबन का दावा
शिकायत में करीब आठ करोड़ रुपये की धनराशि के कथित गबन का आरोप लगाया गया है। एफआईआर के साथ संलग्न वर्षवार वित्तीय विवरण में वर्ष 2013 से 2021 तक विभिन्न संस्थानों से संबंधित नकद लेन-देन और रसीदों के आधार पर प्राप्त रकम का विवरण दर्ज है।
दस्तावेज में दिए गए वर्षवार विवरण के अनुसार, संबंधित अवधि में कुल 7,04,04,525 रुपये की राशि का उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि संस्थान की रकम के संबंध में प्रस्तुत लेखा-जोखा और वास्तविक वित्तीय रिकॉर्ड में अनियमितताएं हैं।
1.04 करोड़ रुपये का हिसाब नहीं मिलने का भी आरोप
शिकायत में 1,04,39,205 रुपये की अतिरिक्त धनराशि का भी उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि यह रकम संस्थान के खाते में जमा कराई गई थी, लेकिन संबंधित अवधि का पूरा लेखा-जोखा और आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए।
शिकायत के अनुसार, इस धनराशि के संबंध में भी हिसाब स्पष्ट नहीं किया गया। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि इस तरह संस्थान की वित्तीय स्थिति और लेन-देन को लेकर गंभीर अनियमितताएं हुईं।
इस बिंदु पर बैंक स्टेटमेंट, कैशबुक, रसीद रजिस्टर, बिल-बाउचर और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड की जांच मामले में अहम साबित हो सकती है।
भारतीय दंड संहिता की पांच धाराओं में मुकदमा दर्ज
प्राथमिकी के अनुसार, देहरादून जिले में 7 अक्टूबर 2026 को एफआईआर संख्या 0521 दर्ज की गई। इसमें भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 408, 420, 467, 468 और 471 का उल्लेख किया गया है।
ये धाराएं सामान्यतः कर्मचारी द्वारा आपराधिक न्यासभंग, धोखाधड़ी, मूल्यवान प्रतिभूति या अन्य दस्तावेजों की जालसाजी, धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी और जाली दस्तावेज को असली के रूप में इस्तेमाल करने से संबंधित हैं।
एफआईआर में दर्ज विवरण के मुताबिक, मामले की विवेचना उपनिरीक्षक दिनेश चमोली को सौंपी गई है। पुलिस अब शिकायत में लगाए गए आरोपों, संबंधित वित्तीय दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की जांच करेगी।
जांच के बाद सामने आएगी वास्तविक स्थिति
मोक्ष आनंद आश्रम से जुड़े संस्थानों में कथित वित्तीय अनियमितताओं का यह मामला कई वर्षों के लेन-देन से जुड़ा बताया गया है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि संस्थान में विश्वास के आधार पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे कर्मचारी ने इसी का फायदा उठाकर वित्तीय गड़बड़ी की।
फिलहाल मामला एफआईआर दर्ज होने और जांच की प्रक्रिया में है। पुलिस की जांच में संबंधित खातों, रसीदों, बिल-बाउचर, बैंक लेन-देन और अन्य अभिलेखों का सत्यापन अहम रहेगा। इन दस्तावेजों की जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि संस्थान को वास्तव में कितना आर्थिक नुकसान हुआ और शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।
नोट: यह खबर उपलब्ध एफआईआर और उसमें दर्ज शिकायत के आधार पर तैयार की गई है। इसमें वर्णित आरोप शिकायतकर्ता के दावे हैं। जांच पूरी होने और न्यायालय में दोष सिद्ध होने से पहले किसी भी आरोपी को दोषी नहीं माना जा सकता।




