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ऋषिकेश। नगर निगम ऋषिकेश में जिला योजना समिति (DPC) के चुनाव ने शहर की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी है। पार्षदों की संख्या के लिहाज से मजबूत स्थिति में नजर आ रही भाजपा को चुनाव में बड़ा झटका लगा है, जबकि बेहद कम संख्या बल के बावजूद कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी ने जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया। चुनाव में एक सीट कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी के खाते में गई, जबकि दूसरी सीट पर भाजपा समर्थित प्रत्याशी जीत हासिल करने में कामयाब रहे।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस चुनाव में भाजपा के पास कांग्रेस के मुकाबले कई गुना अधिक पार्षदों का समर्थन होने का दावा किया जा रहा था, वहां पार्टी दोनों सीटों पर कब्जा जमाने में नाकाम रही। कांग्रेस के महज सात पार्षदों के दम पर एक सीट जीतना अब शहर के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
भाजपा के संख्या बल पर कांग्रेस की रणनीति भारी!
नगर निगम चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो भाजपा के 18, कांग्रेस के 6 और 16 निर्दलीय पार्षद जीतकर आए थे। बाद में तीन निर्दलीय पार्षद भाजपा में शामिल हो गए, जबकि एक निर्दलीय पार्षद ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। इसके बाद राजनीतिक समीकरणों में बदलाव आया और भाजपा के समर्थक पार्षदों की संख्या लगभग 21 तक पहुंच गई, जबकि कांग्रेस के साथ सात पार्षद हो गए। बाकी निर्दलीय पार्षदों की संख्या 12 रह गई।
ऐसे समीकरणों के बीच भाजपा को उम्मीद रही होगी कि वह अपने संख्या बल के दम पर दोनों सीटों पर जीत दर्ज कर सकती है, लेकिन चुनाव परिणामों ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया। कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी की जीत ने यह साफ कर दिया कि स्थानीय निकायों के चुनाव में केवल संख्या बल ही निर्णायक नहीं होता, बल्कि रणनीति, आपसी तालमेल और पार्षदों का व्यक्तिगत रुख भी अहम भूमिका निभाता है।
भाजपा के खेमे में भी सबकुछ ठीक नहीं?
चुनाव के दौरान सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम तब सामने आया, जब भाजपा के एक पार्षद ने जिला योजना समिति के चुनाव से ठीक पहले बगावती तेवर दिखाते हुए खुद चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया और जीत हासिल कर ली। इस घटनाक्रम ने भाजपा के भीतर संभावित असंतोष और आपसी तालमेल को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
वहीं, राजनीतिक सूत्रों के हवाले से यह भी चर्चा है कि भाजपा समर्थित प्रत्याशी की जीत में पार्टी संगठन की अपेक्षा व्यक्तिगत प्रयासों की भूमिका अधिक रही। यह भी कहा जा रहा है कि एक बड़े पद पर बैठे नेता की ओर से सीमित स्तर पर ही समर्थन जुटाने के प्रयास किए गए। हालांकि, इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
सात पार्षदों वाली कांग्रेस ने कैसे बिगाड़ा भाजपा का गणित?
इस पूरे चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू कांग्रेस की जीत है। भाजपा के मुकाबले काफी कम पार्षद होने के बावजूद कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी का जीतना कई राजनीतिक सवाल खड़े करता है। आखिर कांग्रेस ने ऐसा कौन-सा समीकरण बनाया कि भाजपा अपने अधिक संख्या बल के बावजूद दूसरी सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी?
क्या कांग्रेस की रणनीति भाजपा से बेहतर रही, क्या निर्दलीय पार्षदों ने चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाई या फिर भाजपा के भीतर ही समर्थन को लेकर समीकरण बिगड़ गए? इन सवालों के जवाब भले ही अभी स्पष्ट न हों, लेकिन चुनाव परिणाम ने ऋषिकेश की राजनीति में नई बहस जरूर शुरू कर दी है।
ऋषिकेश की राजनीति में किसका बढ़ा कद?
DPC चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए आत्ममंथन का विषय बन सकते हैं, जबकि कांग्रेस को कम संख्या बल के बावजूद मिली जीत से राजनीतिक मनोबल बढ़ाने का मौका मिला है। यह चुनाव एक बार फिर बताता है कि स्थानीय राजनीति में पार्षदों की संख्या से ज्यादा अहम चुनावी रणनीति, आपसी विश्वास और सही समय पर समर्थन जुटाने की क्षमता हो सकती है।
फिलहाल ऋषिकेश के DPC चुनाव का संदेश साफ है—भाजपा के पास संख्या बल ज्यादा था, लेकिन दोनों सीटों पर जीत का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया। वहीं, सात पार्षदों के समर्थन वाली कांग्रेस ने एक सीट जीतकर भाजपा के राजनीतिक गणित को चुनौती दे दी।




