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ऋषिकेश। वर्ष 2019 के रायवाला थाना क्षेत्र के चर्चित मारपीट प्रकरण में प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश, ऋषिकेश की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तीनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने मामले में प्रस्तुत मौखिक, चिकित्सकीय और अन्य साक्ष्यों का बारीकी से परीक्षण करने के बाद अभियोजन पक्ष के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं माना। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता कृष्णा पाण्डेय ने प्रभावी और ठोस पैरवी करते हुए गवाहों के बयानों में मौजूद विरोधाभासों तथा साक्ष्यों की कमियों को न्यायालय के समक्ष प्रमुखता से रखा।
मामले में दोषमुक्त किए गए आरोपियों की पहचान शंकर कश्यप, गौरी कश्यप एवं ज्ञानेन्द्र मलिक के रूप में हुई है। तीनों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 324, 325, 452, 504 एवं 308 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। इनमें चोट पहुंचाने, गंभीर चोट, घर में घुसकर अपराध करने, जानबूझकर अपमानित करने और गैर इरादतन हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप शामिल थे।
अभियोजन पक्ष के अनुसार 21 मार्च 2019 को होली के दिन रायवाला थाना क्षेत्र में सोमप्रकाश नैथानी और उनके कर्मचारी बृजेश कुमार के साथ कथित रूप से मारपीट की घटना हुई थी। इस मामले में पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर विवेचना की थी। बाद में मामला न्यायालय पहुंचा और सत्र परीक्षण संख्या 145/2022 के तहत सुनवाई शुरू हुई।
गवाहों के बयानों में मिले कई अहम विरोधाभास
मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अभियोजन की कहानी और प्रस्तुत साक्ष्यों पर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाए। न्यायालय के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि शिकायतकर्ता की ओर से दी गई तहरीर की लेखन संबंधी स्थिति संदेहास्पद थी। वहीं, गवाहों के बयानों में घटना के समय, आरोपियों की पहचान और घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी को लेकर भी महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आए।
अदालत ने गवाहों के मौखिक बयानों और चिकित्सकीय साक्ष्यों का तुलनात्मक परीक्षण किया। न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत साक्ष्य आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। किसी भी आपराधिक मामले में आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है और केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अधिवक्ता कृष्णा पाण्डेय की ठोस पैरवी रही अहम
इस मुकदमे में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता कृष्णा पाण्डेय ने प्रभावी पैरवी की। उन्होंने न्यायालय के समक्ष अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में मौजूद विरोधाभासों, गवाहों के बयानों की विसंगतियों और चिकित्सकीय साक्ष्यों से जुड़े कानूनी पहलुओं को मजबूती से प्रस्तुत किया।
बचाव पक्ष की ओर से उठाए गए इन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर न्यायालय ने विचार किया। सुनवाई के दौरान सामने आए तथ्यों और साक्ष्यों के समग्र परीक्षण के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है।
30 अक्टूबर को सुनाया गया फैसला
प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश, ऋषिकेश की अदालत ने 30 अक्टूबर 2026 को अपना निर्णय सुनाते हुए शंकर कश्यप, गौरी कश्यप एवं ज्ञानेन्द्र मलिक को आईपीसी की धारा 324, 325, 452, 504 एवं 308 के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
करीब सात वर्ष पुराने इस चर्चित प्रकरण में आए फैसले को बचाव पक्ष की कानूनी पैरवी और साक्ष्यों के न्यायिक परीक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मामले में अधिवक्ता कृष्णा पाण्डेय की ठोस पैरवी ने बचाव पक्ष का पक्ष मजबूती से न्यायालय के समक्ष रखा।




